दिल्ली में हॉस्पिटलों से SOS सन्देश क्यों भेज रहे है डॉक्टर?

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कोरोना के समय अस्पतालों से भेजे जा रहे हैं SOS संदेश क्या है? जिसका अर्थ है क्या है? (What is SOS message from COVID Hospital?)

पिछले कुछ हफ्तों से कोरोना वायरस की दूसरी लहर पुरे देश में फैल रही है। देश में बहुत सारे राज्यों की स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गयी है ऐसा चित्र सामने आ रहा है।(SOS Message

बहुत सारे हॉस्पिटल्स में ऑक्सीजन बेड, दवाइयाँ की बहुत किल्लत हैं और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी महसूस कर रहें है। 

पुरे देश में कोरोना रोगियों के संख्या बहुत बढ़ने लगी हैं उसको कंट्रोल करने के लिए नाइट कर्फ्यू, सख्त प्रतिबंध, संचारबंदी ऐसे नियमों को लागु करने के बावजूद  भी  स्वास्थ्य व्यवस्थाऐं तनाव महसूस कर रही है। इसके साथ-साथ पिछले कुछ दिनों से निजी तथा सरकार अस्पतालों द्वारा राज्य सरकारों को आपातकालीन संदेश भेजकर आपातकालीन स्थिति का इशारा देने का समाचार सामने आ रहे हैं। 

दिल्ली तथा आसपास के क्षेत्र में बहुत सारें निजी अस्पतालों द्वारा आपातकालीन स्थिति का SOS संदेश प्रणाली के ज़रिये ऑक्सीजन की मात्रा कम होने का संदेश राज्य सरकारोंको भेज रहे थे ऐसा समाचार अपने पढ़ा होगा।

 लेकिन ये SOS संदेश क्या है? उसका अर्थ है क्या?, वह कभी भेज सकते है? (what is this SOS message? What does SOS mean? when we can send SOS messages?) 

मूल रूप से इस शब्द का उगम कब हुवा इसके सम्बन्ध में बहुतों को ज्यादा जानकारी नहीं होगी। तो अभी SOS शब्द के और इमरजेंसी इशारा का क्या सम्बन्ध हैं ये हम समझने की कोशीश करेंगे।

इस मुसीबत का इशारा SOS का फुलफॉर्म क्या है (What is Full form of SOS)?

sos meaning in hindi

एसओएस (SOS) का फुलफॉर्म शेव अवर शिप्स (Save Our Ships) यानी हमारी नौकाओं को बचाओ और तो कुछ लोग इसको शेव अवर सोल्स (Save Our Souls) यानी हमारी आत्माओं को बचायो अर्थात् हमें बचा लीजिये भी कहते हैं।

 एसओएस (SOS) का क्या अर्थ है (Meaning of SOS)?

SOS के फुलफॉर्म से ही पता चलता है की यह नाविक तथा समुद्र में जो यात्रा करते हैं और उनके जहाज पर समुद्र में जब संकट आता था और उनको मदद चाहिए होती तब नाविक दल उसे उपयोग करते थे। 

इस आपातकालीन स्थिति (Emergency) का इशारा मोर्स-कोड प्रणाली (Morse-Code) से संकट के समय भेजा जाता था।

मोर्स-कोड (Morse-Code) एक ऐसी प्रणाली है जिससे सांकेतिक भाषा से जहाजों में संदेशों की अदला बदली प्रदान होती थी। 

मोर्स कोड में तीन डॉट (…), तीन लाइन्स (—) तथा तीन डॉट (…) यानी मोर्स कोड में होता है (… —…) इस संकेत का अर्थ है आपातकालीन स्थिति (Emergency) का इशारा है। 

बहुत सारी परदेशी फिल्मों में जैसे कि टाइटैनिक (Titanic Movie) मूवी में जहाज का कप्तान एक मशीन पर तेज बटन दबा कर मदद की गुहार लगा रहा था । 

ऐसे ही मोर्स कोड की मदद से अर्थात् एसओएस (SOS) का संदेश भेजकर मदत मांगी जाती थी।

मोर्स कोड क्या हैं (What is Morse-Code)?

सैम्‍युअल मॉर्स द्वारा विकसित अंग्रेज़ी वर्णमाला के अक्षरों को बिंदु (.) एवं डैश (-) के रूप में संहित कर उन्‍हें विद्युत, ध्‍वनि या वायरलैस सिगनल के रूप में संकेत भेजने की प्रणाली को मोर्स कोड कहते हैं। 

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एसओएस (SOS) का जन्म कैसे हो गया (How was SOS born)?

20 वीं सदी में संदेश परिवहन के लिए वायरलेस तंत्रज्ञान पर आधारित रेडियो टेलीग्राफी का उपयोग जहाजों पर करना सुरु हो गया। 

जब कोई दूसरे जहाज ने हमला कर दिया, तूफान आया या अन्य कुछ संकट आता था तो  इस कोड के ज़रिये मदत मांगी जाती थी, समुद्र में आसपास जो पास दिखते नहीं थे उन जहाज को भी ये सन्देश मोर्स कोड की जरिये से पहुँच जाता था और वो जहाज मदद करने के लिए आते थे। 

शुरू में इसके लिए अलग अलग देशों तथा संस्थानों के अलग अलग कोड्स (Codes) थे। जैसे की अमेरिकन नौसेना एनसी (NC) कोड का उपयोग करते थे। 

अलग अलग जहाजों पर टेलीग्राफ और वायलेस मशीन लगाने वाली मारकोनी (Marconi) कंपनी सीक्यूडी (CQD) कोड का  उपयोग करती थी। 

सबसे पहले जर्मनी  की संस्था “जर्मन रेग्युलेशन ऑफ कंट्रोल स्मार्ट टेलिग्राफी” ने Emergency इशारा कोड को यानि SOS (… —…) को उपयोग करने के लिए कहा।

दुनिया भर के देशों ने SOS को मान्यता क्यों दि (Why countries around the globe recognized SOS)?

 accepted by all countries

20 सदीं में दुनिया भर में आपातकालीन संदेश भेजने के लिए अलग अलग कोड्स का उपयोग किया जा रहा था इसलिए भ्रम की स्थिति निर्माण होती थी। 

अलग अलग  सांकेतिक भाषा और नियमों में भी समस्या होने लगी। इसलिए सब देशों ने एक साथ आकर फैसला लिया की Emergency कोड एकही रहेगा।

1906 बर्लिन में आंतरराष्ट्रीय वायरलेस टेलिग्राम कनव्हेंशन (International Wireless Telegram Convention) में एक ही कोड रखने के संदर्भ में विचार-विमर्श हो गया। 

इस समय इटली की मारकोनी (Marcony) कंपनी ने सुझाव दिया कि “-.-.–.–..”, और “………-..-..-..” यह अर्थात् ट्रीपल एस, ट्रीपल डी, लेकिन ये कोड लम्बा होने के कारण उसे बहुत सारें देशों ने इनकार कर दिया। 

लेकिन जर्मनी का ये कोड “… — …” जो भेजने के लिए आसान तथा जल्दी समझने वाला होने के कारण लगभग सभी देशों मंजूरी दे दी। 

इसलिए SOS कोड को वैश्विक स्तर पर आपातकालीन मदद पूछने के लिए मुसीबत का इशारा कोड की मान्यता प्राप्त हो गयी और इस कोड को सब देशों स्वीकार कर लिया। 

1 जुलाई 1908 है से ही उपयोग होने लगा।

पहली बार SOS कभी भेजा गया था? टाइटैनिक और इसका क्या रिश्ता है? (When was first SOS sent?)

first sos

उत्तर कैलिफोर्निया के पास केप हॅथरस के पास अमेरिकी स्टीमर अज़ाहोई (American steamer Azaoahoe) दुर्घटना ग्रस्त होने के उपरांत अगस्त 1909 में प्रथम आपातकालीन इशारा (SOS) कोड भेजा था। 

अनेक देशों ने एस.ओ.एस.(SOS) को मान्यता दी। हालांकि मारकोनी कंपनी जहाँ जहाँ अपनी सेवा दे रही थे वहाँ वे सीक्यूडी कोड का ही इस्तेमाल करते थे। 

टाइटैनिक के बोर्ड पर भी मार्कोनि (Markony) संदेह प्रणाली थी, जब जहाज समुद्र में तैरता विशाल हिमखंड टकराने के बाद टाइटैनिक ने आपातकालीन सीक्यूडी (CQD) कोड भेज दिया था। 

क्योँकि कुछ ब्रिटिश जहाज मार्कोनी टेलीग्राफी का प्रयोग करते थे तो उन्होंने CQD Code भेज दिया था बाद में जहाज के रेडिओ अफसर ने SOS सन्देश भेजा। 

“SOS” के साल 1908 में लागू होने के बाद भी मार्कोनी ऑपरेटर इसका कभी कभार ही इस्तेमाल करते थे।

15 अप्रैल 1912 को टायटैनिक ने CQD जगह SOS संदेश शुरू में ही भेजते तो उसको जल्दी मदद मिलती थी ऐसा कहना है।

CQD कोड क्या हैं (What is CQD)?

CQD कोड का मतलब है Come Quick Danger (ब्रिटिश प्रणाली), आपातकालीन SOS के पहिले इसका आपातकालीन स्थिति में प्रयोग होता था।

वर्तमान SOS का किस तरह उपयोग होता है (Currently How SOS is used)?

gps in ships in hindi sos system
Photo by Maël BALLAND from Pexels

वर्तमान में  GPS तथा अन्य नए तकनीक के कारण जहाजों में SOS का प्रयोग नहीं हो रहा है। केवल अब SOS को आपातकालीन संदेश करके उपयोग किया जाता है। 

यहाँ तक की कॉर्पोरेट दुनिया में वित्तीय नुकसान होने के बाद फाइनेंसरोंको SOS संदेश भेजते है। 

वैसे ही स्वास्थ्य सुविधा आपूर्ति करनेवाले अस्पतालों (Hospitals) से आपातकालीन स्थिति में भेजते है उसे SOS कहते है। 

कोरोना वायरस के चलते  देश की स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गयी है। बहुत सारे हॉस्पिटल्स में ऑक्सीजन बेड, दवाइयाँ की बहुत किल्लत हैं और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी महसूस कर रहें है। 

ऑक्सीजन की कमी होने के कारन अस्पतालों में आपातकालीन परिस्थिति  बार बार उत्पन हो रही है और स्वास्थ्य व्यवस्थाऐं तनाव महसूस कर रही है। 

ऐसी परिस्थिति मे SOS संदेश से तत्काल मदद मिलाने की संभावना बहुत बढ़ जाती है। कंमेंट कर सकते हैं।

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